जन्म लिया तो सवाल उठे,
“बेटी है” कहकर स्वर झुके,
कदम बढ़े तो बंदिश आई,
हर राह पर कुछ नियम लिखे।
हँसना भी सीमा में रखा,
बोलना भी तौला गया,
सपनों की ऊँची उड़ानों को
अक्सर डर से रोका गया।
पर वह नदिया की धारा जैसी,
चट्टानों से टकराती है,
हर बंदिश के अँधेरे में
अपनी रोशनी जलाती है।
वह पढ़ती है, वह बढ़ती है,
आसमानों को छू लेती है,
जो कहते थे “नहीं हो सकता”,
उनसे आगे निकल जाती है।
बंदिशें उसकी पहचान नहीं,
उसकी हिम्मत उसकी शान है,
वह बेटी, बहन, माँ ही नहीं,
अपने सपनों की उड़ान है।
एक दिन ऐसा भी आएगा,
जब भेदभाव मिट जाएगा,
लड़की के हर छोटे-बड़े सपने को
खुला आसमान मिल जाएगा।
