मैं अपनी पहचान लिखना चाहती हूँ

मैं उड़ना चाहती हूँ,
उन परिंदों की तरह,
जिन्हें आसमान से
इजाज़त नहीं लेनी पड़ती।
मैं जीना चाहती हूँ,
अपने फैसलों के साथ,
बिना किसी डर के,
बिना किसी शर्त के।
बहुत देख ली हैं
रिवाज़ों की दीवारें,
अब अपने लिए
एक खिड़की बनाना चाहती हूँ।
मैं लड़की हूँ,
और बस इतना चाहती हूँ—
खुला आसमान मिले मुझे,
ताकि मैं अपनी पहचान लिख सकूँ।
मैं नहीं चाहती
किसी की परछाई बनना,
अपने सपनों की धूप में
खुद ही चमकना चाहती हूँ।
मेरे भी कुछ अरमान हैं,
मेरी भी कुछ उड़ानें हैं,
जो कैद नहीं हो सकतीं
किसी सोच की सलाखों में।
मैंने अक्सर देखा है
ख़्वाहिशों को दम तोड़ते हुए,
सिर्फ इसलिए कि वे
एक लड़की की ख़्वाहिशें थीं।
मगर अब मैं चुप नहीं रहूँगी,
अपने हक़ की बात कहूँगी,
जो रास्ते बंद मिलेंगे,
उन पर नए निशान गढ़ूँगी।
मैं किताबों में नहीं,
हकीकत में बदलना चाहती हूँ,
उन कहानियों का हिस्सा,
जो हौसलों से लिखी जाती हैं।
मैं चाहती हूँ कि मेरी पहचान
किसी रिश्ते की मोहताज न हो,
मेरे नाम के आगे
बस मेरा नाम ही काफ़ी हो।
मैं लड़की हूँ,
कमज़ोरी नहीं, संभावना हूँ,
एक ऐसी रोशनी
जो हर अँधेरे से लड़ सकती है।
बस खुला आसमान मिले मुझे,
थोड़ी सी अपनी ज़मीन मिले,
और अपने सपनों को जीने की
पूरी आज़ादी मिले।
फिर देखना,
मैं सिर्फ अपनी पहचान नहीं लिखूँगी,
बल्कि उन तमाम लड़कियों के लिए
एक नई कहानी लिख जाऊँगी।

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