कहते हैं,
लड़की को रोटी बनानी आनी चाहिए,
मैं कहती हूँ—
उसे रोटी कमानी भी आनी चाहिए।
क्योंकि चूल्हे की आग से
सिर्फ खाना पकता है,
मगर मेहनत की आग से
पूरा भविष्य बनता है।
रोटी बनाना हुनर है,
इसमें कोई छोटी बात नहीं,
पर उस हुनर को ही
उसकी पूरी पहचान बना देना भी सही नहीं।
उसे किताबों से दोस्ती करने दो,
अपने सपनों को उड़ान भरने दो,
ताकि वह किसी की मजबूरी नहीं,
अपनी ताकत बन सके।
वह चाहे तो रसोई भी संभाले,
चाहे तो दफ़्तर भी,
चाहे तो कारोबार खड़ा करे,
या दुनिया की ऊँचाइयाँ छू ले।
क्योंकि असली सवाल यह नहीं कि
वह कितनी अच्छी रोटी बनाती है,
सवाल यह है कि
क्या वह अपने पैरों पर खड़ी हो पाती है।
वक़्त बदल रहा है,
सोच भी बदलनी होगी,
लड़की को सिर्फ रोटी बनाना नहीं,
रोटी कमाना भी सिखानी होगी।
क्योंकि भूख सिर्फ पेट की नहीं होती,
कुछ भूखें सम्मान की भी होती हैं,
और सम्मान तब मिलता है,
जब अपने फैसलों की कीमत खुद चुकाने की ताकत होती है।
इसलिए मैं कहती हूँ—
लड़की का रोटी बनाना बुरा नहीं,
पर रोटी कमाना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है,
ताकि ज़िंदगी की मेज़ पर
वह मेहमान नहीं,
बराबरी से बैठने वाली इंसान बन सके।